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तेरी अदओ से हटके कुछ देखा है तेरी मदहोशी को पी के देखा है मुस्कुरा न यूहन तू खड़ी खड़ी ए ज़िंदगी! तेरे हर सितम मे जी के देखा है!लगता है जैसे साँसे थम सी रही है आँखों मॅ नींद है एन दिल मॅ करार मुस्कुरा रही है तू खड़ी खड़ी ए ज़िंदगी! तुझे मार के भी जिया है! तन्हाई से मेल हो रहा है खुद ही खुद से बोल रहा है मुस्कुराती क्यो है तू खड़ी खड़ी ए ज़िंदगी! तेरा हर विष पिया है! मुझे ले चल अपने संग कही तेरे बिन हर पलसुना लगता है हँसती है अब तू खड़ी खड़ी ए ज़िंदगी! तेरा मेरा कुछ तो रिश्ता है!! - in General Shayari

जो आपने न लिया हो, ऐसा कोई इम्तहान न रहा, इंसान आखिर मोहब्बत में इंसान न रहा, है कोई बस्ती, जहा से न उठा हो ज़नाज़ा दीवाने का, आशिक की कुर्बत से महरूम कोई कब्रस्तान न रहा, हाँ वो मोहब्बत ही है जो फैली हे ज़र्रे ज़र्रे में, न हिन्दू बेदाग रहा, बाकी मुस्लमान न रहा, जिसने भी कोशिश की इस महक को नापाक करने की, इसी दुनिया में उसका कही नामो-निशान न रहा, जिसे मिल गयी मोहब्बत वो बादशाह बन गया, कुछ और पाने का उसके दिल को अरमान न रहा, - in Inspirational Shayaries